उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में मस्जिद गिराने का क्या है पूरा मामला

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में गिराई गई जिस मस्जिद को ज़िला प्रशासन अवैध निर्माण बता रहा है, सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड के दस्तावेज़ों में वो पिछले छह दशक से ‘तहसील वाली मस्जिद’ के तौर पर दर्ज है.

 

मस्जिद के प्रबंधकों का दावा है कि मस्जिद इससे कहीं ज़्यादा पुरानी है

उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड ने हाई कोर्ट के स्थगन आदेश के बावजूद प्रशासन की इस कार्रवाई को अवैध बताया है और इसे हाई कोर्ट में चुनौती देने का फ़ैसला किया है.

बाराबंकी ज़िले के रामसनेही घाट में तहसील परिसर में मौजूद ग़रीब नवाज़ मस्जिद, जिसे तहसील वाली मस्जिद भी कहा जाता है, को ज़िला प्रशासन ने ‘अवैध निर्माण’ बताते हुए सोमवार को रात में बुलडोज़र से गिरा दिया.

रामसनेही घाट तहसील परिसर में एसडीएम आवास के सामने स्थित यह मस्जिद वक़्फ़ बोर्ड की संपत्ति के तौर पर दर्ज है और मस्जिद के प्रबंधकों का कहना है कि इसे लेकर कभी कोई विवाद भी नहीं हुआ है.

 

प्रशासन ने क्या कहा

एसपी यमुना प्रसाद और डीएम आदर्श सिंह

हालांकि बाराबंकी के ज़िलाधिकारी आदर्श सिंह कहते हैं कि इस संबंध में संबंधित लोगों को 15 मार्च को ही नोटिस दिया जा चुका था और प्रशासन इसे अपने क़ब्ज़े में भी ले चुका था.

डीएम बाराबंकी के ट्विटर हैंडल पर पढ़े गए उनके बयान के मुताबिक़, “तहसील आवासीय परिसर में निर्मित अवैध परिसर के संदर्भ में संबंधित पक्षकारों को 15 मार्च को नोटिस भेजकर स्वामित्व के संदर्भ में सुनवाई का अवसर दिया गया था.

नोटिस तामील होते ही परिसर में रह रहे लोग परिसर छोड़कर फ़रार हो गए थे. तहसील परिसर की सुरक्षा की दृष्टि से तहसील प्रशासन की टीम द्वारा 18 मार्च को क़ब्ज़ा प्राप्त कर लिया गया था.”

“माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद की लखनऊ खंडपीठ द्वारा 2 अप्रैल को इस संबंध में दायर एक याचिका का निपटारा किया जिससे साबित होता है कि यह निर्माण अवैध है. इस आधार पर एसडीएम रामसनेही घाट की कोर्ट में वाद पेश किया गया और फिर उसके आदेश का अनुपालन 17 मई को करा दिया गया.”

मार्च में दिए गए नोटिस के ख़िलाफ़ मस्जिद प्रबंधन कमेटी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जो अभी भी वहाँ लंबित है.

यही नहीं, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 24 अप्रैल 2021 को एक याचिका की सुनवाई करते हुए सरकारी संपत्तियों पर बने किसी भी धार्मिक निर्माण पर कोविड महामारी को देखते हुए 31 मई तक किसी तरह की कार्रवाई न करने का आदेश दिया था.

वक़्फ़ बोर्ड क्या बोला

उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड के अध्यक्ष ज़फ़र अहमद फ़ारूक़ी कहते हैं कि मस्जिद को गिराना सीधे तौर पर हाई कोर्ट के आदेश की अवहेलना है और बोर्ड इसे जल्द ही हाई कोर्ट में चुनौती देगा.

बीबीसी से बातचीत में ज़फ़र अहमद फ़ारूक़ी कहते हैं, “स्थानीय प्रशासन की हठधर्मिता के अलावा मस्जिद को गिराए जाने का कोई और कारण समझ में नहीं आता है. चूँकि एसडीएम के आवास के ठीक सामने थी मस्जिद और शायद उन्हें यह बात पसंद नहीं थी क्योंकि और कोई वजह तो लग नहीं रही.”

वक़्फ़ बोर्ड का सर्टिफ़िकेट

“लोकल कमेटी हाई कोर्ट गई थी, फिर भी बिना कोई नोटिस दिए एसडीएम ने ऑर्डर भी पास कर दिया और अपने ही ऑर्डर की तामील कराकर मस्जिद को गिरवा भी दिया. सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि आख़िर ऐसी क्या जल्दबाज़ी थी कि हाई कोर्ट के आदेश के बावजूद यह कार्रवाई की गई. हम दो-चार दिन के भीतर इस कार्रवाई के ख़िलाफ़ और इसकी जाँच के लिए हाई कोर्ट में याचिका डालेंगे.”

सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि वह “मस्जिद की बहाली, उच्च स्तरीय न्यायिक जाँच और दोषी अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई” की मांग करते हुए हाई कोर्ट का रुख़ करेगा.

सवालों से बचता प्रशासन

ज़िला प्रशासन का दावा है कि यह कार्रवाई क़ानूनी तौर पर की गई है, लेकिन ज़िलाधिकारी या फिर ज़िले का कोई प्रशासनिक अधिकारी इस बारे में किसी सवाल का जवाब नहीं दे रहा है.

रामसनेही घाट के एसडीएम का सरकारी मोबाइल नंबर बंद है, तो ज़िलाधिकारी साफ़तौर पर कहते हैं कि “ट्विटर हैंडल पर जो बयान हमने दिया है, उसके अलावा और कोई बात नहीं करूँगा.”

आम लोगों का क्या है कहना

रामसनेही घाट के निवासी अदनान आरिफ़ कहते हैं कि मस्जिद यहाँ तब से है, जब तहसील परिसर बना भी नहीं था.

अदनान कहते हैं, “नया तहसील परिसर साल 1992 में बना और तभी एसडीएम आवास इस मस्जिद के सामने बनाया गया. जबकि इससे पहले पुरानी तहसील मस्जिद के पीछे थी. मस्जिद साल 1968 से वक़्फ़ बोर्ड की संपत्ति के रूप में दर्ज है और उससे पहले साल 1959 से उसके पास बिजली का कनेक्शन है.”

अदनान कहते हैं, “हर शुक्रवार को यहाँ रोज़ की तुलना में ज़्यादा संख्या में लोग नमाज़ पढ़ने आते थे. मस्जिद का कोई विवाद नहीं था. लेकिन इसी साल मार्च में भीड़ की वजह से कुछ अफ़सरों की गाड़ी फँस गई थी, उसी ग़ुस्से में ताबड़तोड़ मस्जिद गिराने का नोटिस दे दिया गया.”

नोटिस के विरोध में लोगों ने कई दिनों तक स्थानीय प्रशासन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन भी किया था. इस दौरान प्रशासन की ओर से मस्जिद की मीनार से माइक हटाने की भी कोशिश की गई.

विरोध के दौरान कुछ लोगों ने पथराव किया, पुलिस ने लाठीचार्ज किया और कई लोगों को चोटें भी आईं थीं. इस मामले में कई लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज करके जेल भेजा गया. कुछ लोग अभी भी जेल में हैं.

सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड के अध्यक्ष ज़फ़र फ़ारूक़ी कहते हैं कि स्थानीय प्रशासन ने साल 2016 के हाई कोर्ट के जिस आदेश का हवाला देते हुए मस्जिद को हटाने के नोटिस दिया था, वह भी इस मस्जिद पर लागू नहीं होता है.

उनके मुताबिक, “यह आदेश सार्वजनिक संपत्ति पर बने उन धार्मिक स्थलों के बारे में दिया गया था, जो साल 2011 के बाद बने थे. ग़रीब नवाज़ मस्जिद न तो किसी सार्वजनिक संपत्ति का अतिक्रमण करके बनी थी और न ही 2011 के बाद बनी है.”

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