लखीमपुर हिंसा: अजय मिश्रा का राजनीतिक सफर,मंत्री के पद से नहीं हटाएगी भाजपा !

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उत्तर प्रदेश के लखीमपुर हिंसा में नौ लोगों की मौत के मामले में जहां एक ओर सियासत गरमई वहीं दूसरी ओर विपक्ष सरकार पर हमलावर है। किसान नेता से लेकर विपक्ष केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा का इस्तीफा और उनके बेटे आशीष मिश्रा गिरफतारी की लगातार मांग कर रहे हैं।

अजय मिश्रा केंद्रीय मंत्री न बने होते तो ये बवाल नहीं होता !

लखनऊ । उत्तर प्रदेश के लखीमपुर हिंसा में नौ लोगों की मौत के मामले में जहां एक ओर सियासत गरमई वहीं दूसरी ओर विपक्ष सरकार पर हमलावर है। किसान नेता से लेकर विपक्ष केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा का इस्तीफा और उनके बेटे आशीष मिश्रा की गिरफ्तारी की लगातार मांग कर रहे हैं।

विपक्षियों का मानना है कि अजय मिश्रा को अपने पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए ताकि घटना की निष्पक्ष जाँच हो सके। वहीं अजय मिश्रा ने अपने और अपने बेटे के ऊपर लगे सभी आरोपों को बेबुनियाद बताया है लेकिन बीजेपी सरकार की आलोचना के केंद्र में वही हैं। वहीं जानकार इस्तीफा को लेकर अलग-अलग कयास लगा रहे हैं।

विपक्ष मामले की निष्पक्ष जाँच पर संदेह केवल इसलिए नहीं जता रहा है कि अजय मिश्रा गृह राज्य मंत्री होने की वजह से जाँच को प्रभावित कर सकते हैं, बल्कि यूपी की राजनीति के जानकारों का कहना है कि उनकी छवि को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, उन्हें अपने इलाक़े में काफ़ी दबंग छवि वाला नेता माना जाता है।

धमकी भरे भाषण से सुर्खियों में आये

लखीमपुर में हुई हिंसा से कुछ ही दिन पहले सम्पूर्णानगर में हुई एक बैठक में अजय मिश्रा किसान आंदोलन के प्रति अपनी छवि के अनुरूप काफ़ी आक्रामक तेवर में नज़र आए थे।

इस आयोजन के एक वीडियो में मिश्रा कहते हैं, “ऐसे लोगों को कहना चाहता हूँ कि सुधर जाओ…नहीं तो सामना करो आकर, हम आपको सुधार देंगे, दो मिनट लगेगा केवल। मैं केवल मंत्री नहीं हूँ, या सांसद विधायक नहीं हूँ, जो विधायक और सांसद बनने से पहले मेरे विषय में जानते होंगे उनको यह भी मालूम होगा कि मैं किसी चुनौती से भागता नहीं हूँ।

और जिस दिन मैंने उस चुनौती को स्वीकार करके काम कर लिया, उस दिन पलिया नहीं, लखीमपुर तक छोड़ना पड़ जाएगा, यह याद रखना।”

आठ जुलाई को मोदी मंत्रिमंडल में मिली जगह

इसी साल आठ जुलाई को नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार में मिश्रा को जगह मिलना काफी चौंकाने वाला था।

उत्तर प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वाले जानकार भी इस बात अचंभित थे कि मिश्रा ने इतने कम समय में इतनी लंबी छलांग कैसे मारी। पहली बार विधायक बनने के नौ साल के भीतर देश का गृह राज्य मंत्री बनना मामूली बात नहीं है।

ख़ास तौर पर ऐसे वक़्त में जब मोदी सरकार के कैबिनेट विस्तार को पिछड़ी जाति के नेताओं को प्रतिनिधित्व दिए जाने के प्रयास के रूप में पेश किया जा रहा था, जबकि अजय मिश्रा ब्राह्मण हैं।

अजय मिश्रा का इतिहास और मोदी मंत्रिमंडल तक का सफर

लखीमपुर खीरी ज़िले के बनवीरपुर गाँव में जन्मे 61 वर्षीय अजय मिश्रा ने कानपुर के क्राइस्ट चर्च कॉलेज से विज्ञान और डीएवी कॉलेज कानपुर से क़ानून की स्नातक डिग्री हासिल की है।

अजय मिश्रा को उनके निकट के लोग टेनी नाम से बुलाते हैं, उनका रुझान खेलकूद ख़ास तौर पर क्रिकेट, पावर-लिफ्टिंग और कुश्ती की तरफ़ था। उन्होंने अपने छात्र जीवन के दौरान यूनिवर्सिटी और ज़िला स्तर पर इन खेलों के कई मुक़ाबले भी जीते।

समय के साथ मिश्रा इन खेलों के मुक़ाबले आयोजित करने लगे। साल 2012 के विधानसभा चुनाव में अजय मिश्रा निघासन सीट जीतकर पहली बार विधायक बने. इस चुनाव में उन्होंने 31 हज़ार से अधिक वोटों से जीत हासिल की और कुल वोटों का क़रीब 36 फ़ीसदी उन्हें मिला।

जानकारों के मुताबिक, विधायक बनने के बाद अजय मिश्रा का रुतबा तो बढ़ा ही, साथ ही स्थानीय लोगों का कहना है कि वे ज़मीनी स्तर पर बहुत सक्रिय रहे हैं। शायद यही वजह थी कि 2014 के लोकसभा चुनावों में उन्हें खीरी से बीजेपी का प्रत्याशी बनाया गया और वे एक लाख दस हज़ार से ज़्यादा वोटों से जीतकर सांसद बने।

2019 के लोकसभा चुनाव में अजय मिश्रा ने अपनी जीत के अंतर को क़रीब दोगुना करते हुए अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को दो लाख अठारह हज़ार से अधिक वोटों से हराया, इस तरह वे दूसरी बार सांसद बने. इस शानदार जीत से यह साफ़ हो चुका था कि मिश्रा का अपने क्षेत्र में राजनीतिक कद काफी बढ़ गया था।

2019 से 2021 तक मिश्रा कई संसदीय समितियों के सदस्य रहे लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि तब आई जब उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में गृह राज्य मंत्री के पद पर नियुक्त किया गया।

जतीय समीकरण की वजह से बने मंत्री

लखनऊ से एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं कि मिश्रा का अचानक केंद्रीय मंत्री बन जाना बड़े आश्चर्य की बात थी।

वे कहते हैं, “फिर ये समझ में आया कि ब्राह्मण होने की वजह से उन्हें मंत्री बनाया गया। बीजेपी ब्राह्मण वोट खिसक जाने की आशंका को लेकर काफी परेशान है। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों और ठाकुरों में हमेशा टकराव की स्थिति रही है और चूंकि

योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली ठाकुर समर्थक माना जाता है इसलिए ब्राह्मणों में उनके खिलाफ़ नाराज़गी है तो ब्राह्मणों को खुश करने के लिए अजय मिश्रा को मंत्री बना दिया गया।”


वहीं जानकारों की माने तो “ये मंत्री इसलिए बन गए क्योंकि ब्राह्मण कोटे से किसी को लाना था और वो इलाका लखीमपुर, हरदोई, सीतापुर और शाहजहांपुर को कवर करता है जहाँ ब्राह्मण अधिक संख्या में हैं।”

“वे समीकरण में आ गए और मंत्री बन गए। उत्तर प्रदेश से बनाए जाने वाले मंत्रियों में एक ब्राह्मण रखना था, तो इन्हें रख लिया.”

अजय पर हत्या समेत दर्ज है कई मामले

अजय मिश्रा बीजेपी के ज़िला महासचिव के तौर पर राजनीतिक जीवन शुरू किया और “बहुत ही कम समय में संसद सदस्य बन गए”।

2019 में लोकसभा चुनाव के समय दायर किए गए अपने शपथपत्र में मिश्रा ने अपने ख़िलाफ़ साल 2000 में दर्ज हत्या के मामले का ज़िक्र किया है और ये भी बताया है कि सत्र न्यायालय ने उन्हें 2004 में बरी कर दिया।

शपथ पत्र में यह भी बताया गया है कि उन्हें बरी करने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सरकार और मुद्दई ने हाईकोर्ट में अपील की है जो लंबित है।

किसान नेता राकेश टिकैत ने एक बयान में चंदन की लकडी,नेपाल में पेट्रोल डीजल की तस्करी और इलाके का ​​हिस्ट्रीशीटर बताया है।उन्होंने यह जानकारी लोगों से मिलने की बात कही हैं।

 

बाहुबल से चलाई जाने वाली राजनीति में यकीन

जानकारों की माने तो अजय मिश्रा ने स्थानीय स्तर पर बहुत काम किया है और लोगों में उनकी अच्छी पकड़ है।

लोगों से मिश्रा के बारे में ज़्यादातर अच्छा ही सुनने को मिला, लेकिन पिछले कई दिनों से वे उकसाने वाली बातें कर रहे थे और धमकी दे रहे थे कि मैं देख लूँगा और दो मिनट में ठीक कर दूँगा।

गृह राज्य मंत्री बनने के बाद शायद उन्हें लगने लगा कि वे कुछ भी कर सकते हैं।”
वहीं एक जानकार का मानना है कि अजय मिश्रा “बाहुबल से चलाई जाने वाली राजनीति में यकीन रखने वालों में से हैं”

जानकार कहते हैं, “अजय मिश्रा उर्फ़ टेनी अपनी राजनीति डेयर-डेविल तरीके से करते हैं। अगर मिश्रा केंद्रीय मंत्री न बने होते तो ये बवाल नहीं होता। उन्हें मंत्री बनाने के पीछे सरकार और बीजेपी की मंशा कहीं न कहीं किसान आंदोलन को आड़े हाथों लेने की भी रही होगी क्योंकि 2022 में विधानसभा चुनाव भी होने हैं।”

जानकारों की माने तोतराई के इलाके में रहने वाले सिख लोग किसान आंदोलन के बाद बीजेपी के लिए चुनौती के रूप में उभर रहे थे और कृषि क़ानूनों का विरोध कर रहे किसानों के लिए लखीमपुर से पैसा, अनाज और अन्य सामान भेजा जा रहा था। उनके अनुसार इन्हीं बातों का मुक़ाबला करने के लिए अजय मिश्रा के कद को बढ़ाया गया।

तो क्या बीजेपी उन्हें मंत्री के पद से हटा सकती है?

एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी पाँच अक्तूबर को लखनऊ आए और उन्होंने इस घटना का कोई ज़िक्र तक नहीं किया।

“जब इतनी भी संवेदना नहीं है तो ये उम्मीद नहीं की जा सकती कि वो कोई कार्रवाई करेंगे।” फिलहाल अजय मिश्रा को अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले हटाया जाना संभव नहीं लग रहा हैं।