एटीएस की छापेमारी में म्यांमार का रोहिंग्या अजीजुल्लाह गिरफ्तार

लखनऊ। यूपी में रोहिंग्या मुसलमानों की तलाश में बुधवार को एटीएस ने कई जिलों में छापेमारी की। छापेमारी के दौरान एटीएस ने सतंकबीरनगर जिले के खलीलाबाद से म्यांमार के रहने वाले अजीजुल हक उर्फ अजीजुल्लाह को गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस के अनुसार गिरफ्तार किया गया आरोपी फर्जी पासपोर्ट के आधार पर 19 साल से भारतीय बनकर रह रहा था। आरोपी के पास से पकड़े के आरोपी के साथ लोगों की तलाश जारी है। आरोपी के पास से पुलिस को कई बैंक खातों के कागजात मिले है, जिसमें कई स्रोतों से रकम भी आई थी। आरोपी के फोन की भी पुलिस जांच करा रही है।

अपर पुलिस महानिदेशक, कानून व्यवस्था प्रशांत कुमार ने बताया कि एटीएस को सूचना मिली थी कि म्यांमार निवासी रोहिंग्या अवैध रूप से भारत में प्रवेश करके यूपी के कई जिलों में रह रहे हैं। जांच पड़ताल में पता चला कि पकड़े गए आरोपी ने दो पासपोर्ट भी बनवा रखे थे। इसके साथ ही उसने फर्जी राशन कार्ड, सर्टिफिकेट भी बना रखे हैं।

फर्जी पासपोर्ट पर उसने सऊदी अरब और बांग्लादेश की यात्रा भी की है। जांच पड़ताल में ये भी पता चला कि 2017 में इसमें अपनी मां, बहन और दो भाइयों को भी अवैध रूप से भारत में प्रवेश करा चुका है, आरोपी ने उनके भी फर्जी दस्तावेज बनवाए थे।

संदिग्ध से एटीएस कर रही पूछताछ

एडीजी ने बताया कि यूपी एटीएस दूसरे राज्यों में भी रोहिंग्या मुसलमानों की छापेमारी कर रही है। उन्होंने बताया कि एटीएस की यूपी के अलग-अलग जिलों में छापेमारी जारी है। एडीजी ने बताया कि आरोपी के पास से दो भारतीय पासपोर्ट, तीन आधार कार्ड, एक पैन कार्ड, तीन डेबिट कार्ड, राशन कार्ड और पांच बैंकों की पासबुक मिली है। पकड़ा गया आरोपी मूल रूप से म्यांमार के नयाफारा थाना बुलिडंग, जिला आक्याब रखाइन का रहने वाला है।

19 साल से रह रहा था भारत में

एटीएस की छापेमारी में गिरफ्तार रोहिंग्या अजीजुल्लाह ने पूछताछ में बताया कि वह पिछले 19 साल से भारत में आराम से रह रहा था। 2001 में वह बांग्लादेश के रास्ते भारत आया था। इसके बाद उसने अपने नाम से फर्जी राशन कार्ड, आधार कार्ड और भारतीय पासपोर्ट तैयार करवाया।

पूछताछ में आरोपी ने बताया कि 2017 में वह अपनी मां आबिदा खातून, बहन फातिमा खातून, दो भाई जिया उल हक और मोहम्मद नूर को भी भारत ले आया था। उसके भाई जियाउल हक इस समय नासिक में रहता है। बहनोई नूर आलम और भाई मोहम्मद नूर खलीलाबाद आने के बाद कहीं चले गए हैं।

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