इलाहाबाद हाई कोर्ट से बीएड की फर्जी डिग्री के कारण बर्खास्त अध्यापकों को राहत नहीं

Allahabad High Court बीएड की फर्जी डिग्री लगाकर नौकरी करने वाले बर्खास्त 2823 शिक्षको को इलाहाबाद हाई कोर्ट से भी राहत नहीं मिली है। योगी आदित्यनाथ सरकार ने इनको नौकरी से बर्खास्त किया तो यह लोग राहत पाने के लिए जिला अदालतों के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचे।

उत्तर प्रदेश के विभिन्न स्कूलों में बीएड की फर्जी डिग्री लगाकर नौकरी करने वाले बर्खास्त 2823 शिक्षको को इलाहाबाद हाई कोर्ट से भी राहत नहीं मिली है। योगी आदित्यनाथ सरकार ने इनको नौकरी से बर्खास्त किया तो यह लोग राहत पाने के लिए जिला अदालतों के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचे, लेकिन इनको निराश होना पड़ा। यह आदेश न्यायमूर्ति एमएन भंडारी तथा न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की खंडपीठ ने किरण लता सिंह सहित हजारों सहायक अध्यापकों की विशेष अपील को निस्तारित करते हुए दिया है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अहम फैसला दिया है। आगरा के डॉ. बीआर अम्बेडकर विश्वविद्यालय से 2005 में बीएड की फर्जी डिग्री के आधार पर प्राथमिक विद्यालयों में नियुक्त 2823 सहायक अध्यापकों के अंकपत्र, डिग्री, नियुक्ति रद करने व बर्खास्तगी आदेश को सही मानते हुए हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया है। इन लोगों ने जांच में अपना पक्ष ही नहीं रखा था। इसके बाद बीएसए ने इन्हेंं इसी आधार पर बर्खास्त कर दिया है। कोर्ट ने इन्हेंं कोई राहत नहीं दी है।

इसके साथ ही अंक पत्र से छेड़छाड़ के आरोपी और फर्जी डिग्री पर कारण बताओ नोटिस का जवाब देने वाले 812 सहायक अध्यापकों को थोड़ी राहत दी है। कोर्ट ने एकल पीठ की ओर से विश्वविद्यालय को दिए गए जांच के आदेश को सही माना है तथा जांच चार माह में पूरा करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि जांच पूरी होने तक इनकी बर्खास्तगी को स्थगित रखा जाए। इन्हेंं चार माह तक वेतन पाने व कार्य करने देने का निर्देश दिया है। हाई कोर्ट ने जांच की निगरानी कुलपति को सौंपते हुए कहा है कि जांच में देरी हुई तो उन्हेंं वेतन पाने का हक नहीं होगा। जांच की अवधि नहीं बढ़ेगी।

कोर्ट ने कहा है कि जांच के बाद जिनके विद्यालय में प्रवेश व परीक्षा में बैठने की पुष्टि होगी, उनकी बर्खास्तगी वापस ले ली जाय। शेष की बर्खास्तगी चार माह बाद प्रभावी हो जायेगी। कोर्ट ने दस्तावेज पेश करने वाले उन सात अभ्यॢथयों को एक माह में सत्यापन कराने का भी निर्देश दिया है और कहा है कि यदि सही हो तो इनकी बर्खास्तगी रद की जाय। अपील पर अपर महाधिवक्ता एमसी चतुर्वेदी, अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता रामानंद पांडेय व स्थायी अधिवक्ता राजीव सिंह ने प्रतिवाद किया। न्यायमूॢत शमशेरी ने वरिष्ठ न्यायमूॢत भंडारी के फैसले से सहमति जताते हुए अलग से हिंदी भाषा में फैसला दिया। जिसमें उन्होंने गुरु के महत्व को बताते हुए कहा कि शिक्षा एक पवित्र व्यवसाय है, यह जीविका का साधन मात्र नहीं है। राष्ट्र निर्माण में शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कोई छल से शिक्षक बनता है तो ऐसी नियुक्ति शुरू से ही शून्य होगी। कोर्ट ने कहा कि छल कपट से शिक्षक बन इन्होंने न केवल छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ किया है, अपितु शिक्षक के सम्मान को ठेस पहुंचाई है।

 

गौरतलब है कि आगरा विश्वविद्यालय की 2005 की बीएड की फर्जी डिग्री के आधार पर हजारों लोगों ने सहायक अध्यापक की नियुक्ति प्राप्त कर ली। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जांच का आदेश देते हुए एसआइटी गठित की। जिसने अपनी रिपोर्ट में व्यापक धांधली का खुलासा किया। सभी को कारण बताओ नोटिस जारी की गयी। 814 लोगों ने जवाब दिया। शेष आये ही नहीं। बीएसए ने फर्जी अंक पत्र व अंक पत्र से छेड़छाड़ की दो श्रेणियों वालों को बर्खास्त कर दिया। हाईकोर्ट की एकल पीठ ने छेड़छाड़ करने के आरोपियों व जवाब देने वालों की विश्वविद्यालय को जांच करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि बर्खास्त अध्यापकों से अंतरिम आदेश से लिए गये वेतन की बीएसए वसूली कर सकता है। खंडपीठ ने एकलपीठ के आदेश के इस अंश को रद कर दिया है। 812 अध्यापकों की जांच पूरी करने के आदेश की समय सीमा निर्धारित कर दी है। जांच के बाद सही पाये जाने पर नौकरी रहेगी अन्यथा चार माह बाद शेष की बर्खास्तगी बहाल हो जाएगी।

 

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