148 वर्ष बाद दुर्लभ संयोग : सूर्यग्रहण के साथ ही शनि जयंती तथा वट सावित्री व्रत भी आज

आज वर्ष का पहला सूर्यग्रहण होने के साथ ही शनि जयंती तथा वट सावित्री का व्रत भी है। सूर्य ग्रहण आज दोपहर में एक बजकर 42 मिनट से शुरू होकर शाम छह बजकर 41 मिनट पर खत्म होगा।

ज्येष्ठ मास की अमावस्था तिथि पर गुरुवार को 148 वर्ष बाद दुर्लभ संयोग बन रहा है। आज वर्ष का पहला सूर्यग्रहण होने के साथ ही शनि जयंती तथा वट सावित्री का व्रत भी है। सूर्य ग्रहण आज दोपहर में एक बजकर 42 मिनट से शुरू होकर शाम छह बजकर 41 मिनट पर खत्म होगा।

वर्ष का पहला सूर्य ग्रहण काल पांच घंटे तक रहेगा। सूर्य ग्रहण के समय सभी नौ ग्रहों में से चार ग्रह एक ही राशि में मौजूद रहेंगे। बाकी के पांच ग्रह पांच अलग-अलग राशियों में मौजूद रहेंगे। सूर्य ग्रहण के समय सभी नौ ग्रहों में से चार ग्रह एक ही राशि में मौजूद रहेंगे। बाकि के पांच ग्रह पांच अलग-अलग राशियों में रहेंगे। वृषभ राशि में सूर्य, बुध, राहु व चंद्रमा रहेंगे। मिथुन राशि में शुक्र, कर्क राशि में मंगल, वृश्चिक में केतु, मकर में शनि और कुंभ राशि में गुरु ग्रह रहेंगे।

148 वर्ष बाद अद्भुत संयोग

शनि जयंती तथा सूर्य ग्रहण एक ही दिन होने का अद्भुत संयोग 148 वर्ष के बाद बन रहा है। शनि जयंती के दिन ही गुरुवार को वर्ष का पहला सूर्य ग्रहण पड़ रहा है। सूर्य ग्रहण भारत के अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख में ही आंशिक दिखाई देगा। इस बार लगने वाला ग्रहण भारत के अन्य हिस्सों में दिखाई नहीं देगा। ऐसे में इसका सूतक काल भी मान्य नहीं होगा और न किसी राशियों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा।

वलयकार सूर्यग्रहण ग्रीनलैंड, उत्तर-पूर्वी कनाडा, उत्तरी अमेरिका में दिखाई पड़ेगा। शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या जिन राशियों पर चल रही हैं, उनके पास शनिदेव को प्रसन्न करने का आज अच्छा मौका है। आज शनि जयंती के दिन ही सूर्य ग्रहण का संयोग भी पड़ रहा है। इससे पहले 26 मई 1873 में ऐसा संयोग पड़ा था।

ऐसे बन रहे हैं संयोग

इस बार लगने वाला सूर्य ग्रहण, वृषभ राशि और मृगशिरा नक्षत्र में पडऩे वाला है। मृगशिरा नक्षत्र के स्वामी मंगल ग्रह को माना गया है। इस समय वक्री शनि मकर राशि में है और उनकी दृष्टि मीन व कर्क राशि में विराजमान मंगल ग्रह पर है। शनि को सूर्यपुत्र कहा गया है। शनि जयंती के दिन साढ़ेसाती और ढैय्या वालों को विशेष पूजा करनी चाहिए। शनि जिस राशि में विराजमान होते हैं। उसके आगे और पीछे की राशि व उस राशि पर भी शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव शुरू हो जाता है। ऐसे में इस समय शनि मकर में स्थित है। वहीं इनके पहले की राशि धनु और बाद की राशि कुंभ पर साढ़ेसाती जारी है।

इन राशियों पर है शनि की ढैया 

इसके अलावा जिस राशि में शनि स्थित होते हैं उसके षष्ठम और दसवीं राशि पर शनि की ढैया चलती है। ऐसे में फिलहाल मिथुन और तुला राशि वालों पर शनि की ढैया जारी है। यही कारण है कि इन्हेंं और बुरे प्रभावों से बचने के लिए शनि जयंती पर विशेष पूजा-अर्चना करके उन्हेंं प्रसन्न करने की कोशिश करनी चाहिए। शनि देव के अशुभ प्रभावों से बचने के लिए व्यक्ति को हनुमान जी की पूजा करनी चाहिए। धाॢमक कथाओं के अनुसार हनुमान जी के भक्तों पर शनि की बुरी नजर नहीं पड़ती है।

शनि जयंती और धार्मिक मान्यता 

धार्मिक मान्यता के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को शनि देव का जन्म हुआ था इसलिए प्रत्येक वर्ष इस दिन को शनि जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस बार शनि जयंती 10 जून 2021 दिन गुरुवार को मनाई जाएगी। शनि को देव और ग्रह दोनों का दर्जा दिया गया है। इनके विषय में मान्यता है कि ये पल भर में रंक को राजा और राजा को भी रंक बना सकते हैं। ज्योतिष में शनि को क्रूर ग्रह माना जाता है। ज्यादातर लोग शनि का नाम सुनकर ही घबरा जातें हैं, क्योंकि इनको लेकर कई तरह की भ्रांतियां हैं। इन्हेंं मारक, अशुभ और दुख कारक माना जाता है, किंतु यह मनुष्य को उसके कर्म के अनुसार फल प्रदान करते हैं। बुरे कर्म करने वालों के लिए दंड नायक हैं तो अच्छे कर्म करने वालों को शनिदेव अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं। इन्हेंं न्यायधीश और कर्मफलदाता कहा जाता है।

हनुमान भक्तों पर कृपा दृष्टि 

हनुमान भक्तों पर भी शनिदेव अशुभ दृष्टि नहीं डालते हैं। इस विषय में पौराणिक कथा मिलती है कि हनुमान जी ने शनिदेव को रावण के बंधन से मुक्त कराया था। शनि देव सूर्य के पत्नी छाया के पुत्र हैं, इनके भाई यम और मनु हैं और इनकी बहन यमुनाजी हैं। शनिदेव अपनी बहन यमुना से विशेष प्रेमभाव रखते हैं। शनिदेव सभी ग्रहों में सबसे धीमी गति से भ्रमण करने वाले ग्रह हैं। शनै-शनै चलने के कारण इन्हेंं शनैश्चर भी कहा जाता है। इनका वर्ण काला है और यह नीले वस्त्र धारण करते हैं। यह गिद्ध पर सवारी करते हैं। इनके एक हाथ में धनुष तो दूसरा हाथ वरमुद्रा में रहता है। इनका अस्त्र लोहे का इसलिए लोहा इनकी धातु मानी गई है।

आज वट सावित्री का भी व्रत 

वट सावित्री व्रत भी गुरुवार को ही है। वट सावित्री व्रत से अखंड सौभाग्य की प्राप्त होती है। हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत बेहद खास और महत्वपूर्ण है। धाॢमक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत को सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और संतान प्राप्ति के लिए रखती हैं। हर साल ज्येष्ठ माह में कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि के दिन यह व्रत रखा जाता है। इस व्रत को रखने से अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। व्रत का उद्देश्य सौभाग्य की वृद्धि और पतिव्रत के संस्कारों को आत्मसात करना होता है। वट सावित्री व्रत में ‘वट’ और ‘सावित्री’ दोनों का विशिष्ट महत्व माना गया है। वट या बरगद के पेड़ का भी विशेष महत्व है। पुराणों में यह स्पष्ट किया गया है कि वट में ब्रह्मा, विष्णु व महेश तीनों का वास है। इसके नीचे बैठकर पूजन, व्रत कथा आदि सुनने से मनोकामना पूरी होती है। वट वृक्ष अपनी विशालता के लिए भी प्रसिद्ध है। वट वृक्ष ज्ञान व निर्वाण का भी प्रतीक है। भगवान बुद्ध को इसी वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। इसी कारण वट वृक्ष को पति की दीर्घायु के लिए पूजना इस व्रत का अंग बना। महिलाएं व्रत-पूजन कर कथा कर्म के साथ ही साथ वट वृक्ष के आसपास सूत के धागे परिक्रमा दौरान लपेटती हैं।

वट सावित्री व्रत का महत्व 

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता सावित्री अपने पति के प्राण यमराज से मुक्त कराकर ले आई थीं। इसी वजह से इस व्रत का विशेष महत्व है। व्रत में महिलाएं वट वृक्ष और सावित्री-सत्यवान की पूजा करती हैं। धाॢमक मान्यताओं के अनुसार वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवताओं का वास होता है, जिसके कारण सुहागिनों को विशेष फल की प्राप्ति होता है। मान्यता के अनुसार, वट सावित्री व्रत की कथा को सुनने मात्र से ही व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। इस व्रत से सुहागिन महिलाओं को अखंड सौभाग्य और संतान की प्राप्ति होती है।

 

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