UP Election 2022 : पहली बार लखनऊ में घिरी BJP : अटल प्रभाव की 5 सीटों में से 3 पर मुश्किल में…

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UP Election 2022 : राजधानी लखनऊ का कोई भी चुनाव पूर्व पीएम स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेई के नाम के बिना अधूरा है। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी लखनऊ की 9 सीटों में से 8 पर भाजपा जीती थी। इसमें 5 सीटें अटल के नाम पर निकली थीं। लेकिन साल 1991 के बाद यह पहला चुनाव है जब अटल का नाम चुनावी शोर से गायब है। इस बार इन 5 सीटों में से 3 सीटों पर भाजपा मुश्किल में दिख रही है।

ऐसा क्यों ? तो राजनीतिक पंडित बताते हैं कि लखनऊ की 9 में से 5 सीटों पर अटल का नाम ही चलेगा, जो कि इस बार कहीं दिख नहीं रहा। उदाहरण देकर समझाते हैं कि लखनऊ में सभासद, मेयर,

विधानसभा या लोकसभा, कोई भी चुनाव हो, यहां भाजपा के लिए अटल का नाम जरूरी होता था। 2014 के लोक सभा चुनाव में मोदी लहर में भी पोस्टर और नारों में कई जगह अटल का नाम था। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी अटल का नाम था।

लखनऊ में 1991 से अटल बिहारी वाजपेई 2004 तक लगातार लखनऊ से सांसद चुने गए। तब लखनऊ लोकसभा में 5 विधानसभा सीटें आती थी। लखनऊ पूर्व, पश्चिम, मध्य, कैंट और महोना। इस बार जब अटल का नाम गायब है,

तब इन 5 में से 3 सीटों पर भाजपा को कड़ी टक्कर मिल रही है। लखनऊ का मध्य, पश्चिम और बीकेटी विधानसभा का चुनाव भाजपा के लिए अभी फंसा हुआ है। हालांकि, दिलचस्प बात यह भी है कि इन सीटों पर पार्टी ने उन्हें ही प्रत्याशी बनाया है,

जो अटल बिहारी बाजपेई के समय मंडल और वार्ड के कार्यकर्ता रहे। दैनिक भास्कर रिपोर्टर विनोद मिश्रा और आदित्य तिवारी ने लखनऊ की सभी 9 सीटों का हाल जाना। आइए समझते हैं कि अटल प्रभाव वाली 5 सीटों का इस बार सियासी गणित क्या कहता है?

अटल प्रभाव वाली ये हैं 5 सीटें

  • लखनऊ मध्य
  • लखनऊ पूर्व
  • लखनऊ पश्चिम
  • लखनऊ कैंट
  • बख्शी का तालाब

UP Election 2022 : लखनऊ मध्य विधानसभा सीट पर ध्रुवीकरण से उम्मीद

जब अटल बिहारी वाजपेई लखनऊ से चुनाव लड़ते थे, तब रजनीश गुप्ता अहियानगर के सभासद थे। इस बार इन्हें पार्टी ने मध्य विधानसभा से उम्मीदवार बनाया है। रजनीश गुप्ता को यहां से सपा के रविदास मेहरोत्रा कड़ी टक्कर दे रहे हैं।

मुस्लिम और वैश्य बहुल वाली इस सीट पर जातीय समीकरण बहुत मायने रखते हैं। करीब 3 लाख 68 हजार 500 मतदाता वाली इस सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब एक लाख है, तो वहीं वैश्य भी करीब 80 हजार हैं। इसके बाद कायस्थ और ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या है।

माना जा रहा है कि इस बार मुस्लिम मतदाता सपा के साथ हैं। साथ ही, रविदास मेहरोत्रा को भी यहां जमीनी कार्यकर्ता माना जाता है और 2017 में भी जब मुस्लिम मतों का बिखराव हुआ था तब भी रविदास ने बृजेश पाठक को कड़ी टक्कर दी थी। इसीलिए कहा जा रहा है कि इस बार अगर मुस्लिम मतदाता नहीं बंटे तो रजनीश की राह मुश्किल हो सकती है।

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पश्चिमी विधानसभा सीट पर भी ध्रुवीकरण का ही सहारा

अटल के समय मंडल कार्यकर्ता रहे अंजनी श्रीवास्तव को भाजपा ने पश्चिमी विधानसभा से प्रत्याशी बनाया है। 1991 के बाद अधिकतर समय इस सीट पर भाजपा का कब्जा रहा। 1996, 2002 और 2007 में लगातार तीन बार लालजी टंडन यहां से चुनाव जीते। 2017 में सुरेश श्रीवास्तव इसी सीट से जीत कर विधानसभा पहुंचे।

इस बार उनके निधन के बाद पार्टी ने पुराने कार्यकर्ता अंजनी श्रीवास्तव को मौका दिया है, तो वहीं सपा ने पिछली बार बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ चुके अरमान खान पर भरोसा जताया है।

बसपा ने कायम रजा और कांग्रेस ने सामाजिक कार्यकर्ता शाहना सिद्दीकी को मैदान में उतारा है। जाहिर है पश्चिम में सपा, बसपा व कांग्रेस से मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में हैं। कहा जा रहा है कि अगर इस बार वोटों का ध्रुवीकरण होता है, तो अंजनी के लिए थोड़ी आसानी होगी।

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अटल के जमाने की महोना सीट को अब बख्शी का तालाब के नाम से जाना जाता है। इस बार अटल के चुनावी कार्यकर्ता रहे योगेश शुक्ला को भाजपा ने यहां से प्रत्याशी बनाया है। लखनऊ के बीकेटी क्षेत्र में यादव, कुर्मी, दलित और मुस्लिम वोटरों की भूमिका निर्णायक मानी जाती है।

पिछले चुनाव में इन वोटों में बिखराव का खामियाजा बसपा के नकुल दुबे और सपा के गोमती को उठाना पड़ा और बीजेपी ने जीत दर्ज करने में सफलता पाई। इस बार योगेश शुक्ला के मुकाबले सपा ने फिर से गोमती यादव को मैदान में उतारा है।

यहां एक बार फिर गोमती को लेकर चर्चा जोरों पर है। पिछली बार बीकेटी के यादव भी भाजपा के साथ गए थे, लेकिन इस बार यादव और मुस्लिम साथ आए, तो भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी कर सकते हैं।

भाजपा के लिए कैंट और पूर्वी विधानसभा हमेशा से सबसे सुरक्षित
लखनऊ की पूर्व और कैंट विधानसभा सीट हमेशा से भाजपा की मानी जाती है। भाजपा ने कैंट सीट से बृजेश पाठक और पूर्व से आशुतोष टंडन को मैदान में उतारा है। आशुतोष टंडन को सपा से अनुराग भदौरिया और बृजेश पाठक को कैंट में सपा के राजू गांधी टक्कर दे रहे हैं।

हालांकि, इस बार चुनाव में भी इन दोनों सीटों पर भाजपा की राह आसान दिख रही है। शहरी क्षेत्र की इन दोनों विधानसभा सीट को भाजपा अपने खाते में जोड़ रही है।

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सरोजनीनगर में दिलचस्प लड़ाई
मोदी लहर में पहली बार भाजपा के खाते में आई सरोजनीनगर विधानसभा सीट को एक बार फिर भाजपा अपनी सीट बनाना चाहती है। इसीलिए इस बार यहां से पार्टी ने एनकाउंटर स्पेशलिस्ट और ईडी के जॉइंट डायरेक्टर रहे राजेश्वर सिंह को उम्मीदवार बनाया है।

मुकाबले में समाजवादी पार्टी ने पूर्व कैबिनेट मंत्री अभिषेक मिश्रा को मैदान में उतारा है। दरअसल, साल 2002 और 2007 में लगातार दो बार बसपा के मोहम्मद इरशाद खान ने जीत दर्ज की थी। इस बार बसपा ने जलीस खान को तो कांग्रेस ने रुद्र दमन सिंह को टिकट दिया है।

सरोजनीनगर की जनता क्या कहती है?
यहां जनता के बीच दोनों नेताओं की पारिवारिक पृष्ठभूमि की चर्चा ज्यादा हो रही है। राजधानी लखनऊ की सरोजनीनगर विधानसभा क्षेत्र के पराग चौराहे के पास एक छोटे से टी स्टाल पर इस बार चुनावी मैदान में उतरे प्रत्याशियों को लेकर चर्चा हो रही थी। बुजुर्ग राधे श्याम सिंह कहते है कि पूरी दुनिया अपने पद और पैसे के पीछे भागती है,

लेकिन राजेश्वर सिंह तो वो सब छोड़ कर हमारे बीच आए हैं। वो एक बड़े पद पर थे, चाहते तो खूब पैसा कमाते। पुलिस में रहते हुए भी बड़े-बड़े अपराधियों का एनकाउंटर किया, ईडी में रहते हुए घोटालेबाजों को जेल पहुंचाया। अब हमारे बीच आकर हमसे मदद मांग रहे हैं। हम तो उनके साथ हैं। यहां मौजूद तमाम लोग राधेश्याम से सहमत दिखे।

वहीं, वृंदावन के चिड़ियाबाग एरिया में सेना में कैप्टन रहे राजेश कुमार यादव कहते हैं कि राजेश्वर और अभिषेक में अभिषेक मिश्रा हमेशा आगे रहेंगे। अभिषेक हम लोगों के बीच के हैं। वो प्रोफेसर रहे हैं। उनके पिता भी एक आईएएस अधिकारी रहे हैं। पूरा शिक्षित परिवार है और सबसे बड़ी बात अभिषेक का व्यवहार। सबके सुख-दुख में शामिल होते हैं।

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लखनऊ उत्तर में लड़ाई में दिख रहीं हैं पूजा शुक्ला
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को काला झंडा दिखाकर चर्चा में आईं पूजा शुक्ला को सपा ने मैदान में उतारा है। छात्र नेता रहीं पूजा ने साल 2017 में सीएम योगी आदित्यनाथ को काला झंडा दिखाया था। इसके बाद पूजा को पुलिस ने गिरफ्तार किया था। उन्हें घसीटकर ले जाने वाली तस्वीर सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई और पूरे प्रदेश से पूजा के समर्थन में लोग सामने आए।

पूजा को 26 दिनों तक जेल में रहना पड़ा था। तब मुलायम सिंह यादव उनसे मिलने जेल भी गए थे। जेल से छूटने के बाद अखिलेश और डिंपल ने पूजा से मुलाकात की थी। इस बार डिंपल की सिफारिश पर अखिलेश ने पूजा को उत्तरी सीट से प्रत्याशी बनाया है। पूजा यहां भाजपा के विधायक नीरज बोरा को कड़ी टक्कर दे रही हैं।

मोहनलालगंज सीटः त्रिकोणीय मुकाबला, देखने को मिलेगी कांटे की टक्कर
पूर्व विधायक अमरीश पुष्कर ने सपा की ओर से नामांकन किया था, लेकिन उनका ऐन मौके पर टिकट काटकर दो बार की सांसद रहीं सुशीला सरोज को सपा ने अपना उम्मीदवार बना दिया। वहीं, कांग्रेस ने मालवीयनगर वार्ड की दो बार से पार्षद ममता चौधरी को उम्मीदवार बनाया है।

वहीं, भाजपा ने इस बार अमरेश कुमार पर दांव लगाया है। अमरेश केंद्रीय राज्य मंत्री कौशल किशोर के करीबी माने जाते हैं। इस बार इनको उम्मीदवार बनाने के पीछे का मकसद ये है कि भाजपा इस सीट को अपने खाते में करने की पूरी कोशिश में लगी है। वहीं, बसपा ने युवा देवेंद्र पासी को अपना उम्मीदवार बनाया है।

मलिहाबाद सीटः यहां भी मुकाबला त्रिकोणीय, कोई भी मार सकता है बाजी
सपा ने सोनू कनौजिया को टिकट दे दिया। इससे नाराज सपा के पूर्व विधायक इंदल रावत ने कांग्रेस का दामन थाम लिया। कांग्रेस ने राम करन पासी का टिकट काटकर इंदल रावत को मैदान में उतार दिया। वहीं,

भाजपा ने मौजूदा विधायक जय देवी को मैदान में उतारा है। इतना ही नहीं, बसपा ने नए चेहरे जगदीश रावत पर दांव खेला है। अब जातीय समीकरण देखें, तो इस सीट पर किसी को आगे या पीछे नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि इन प्रत्याशियों की जनता के बीच पकड़ मजबूत है। इसलिए चारों उम्मीदवारों के बीच दिलचस्प मुकाबला है।