ममता बनर्जी की 18 वर्ष पहले की कसम: पुलिस ने घसीटते हुए सीढ़ियों से उतारा

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जुलाई, 1993 में उनके युवा कांग्रेस अध्यक्ष रहते राज्य सचिवालय राइटर्स बिल्डिंग अभियान के दौरान पुलिस की गोली से 13 युवक मारे गए थे. उस अभियान के दौरान ममता को भी चोटें आई थीं. लेकिन उसके पहले उसी साल सात जनवरी को नदिया ज़िले में एक मूक-बधिर बलात्कार पीड़िता के साथ राइटर्स बिल्डिंग जाकर तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु से मुलाक़ात के लिए वो उनके चेंबर के दरवाजे के सामने धरने पर बैठ गई थीं.

ममता का आरोप था कि राजनीतिक संबंधों की वजह से ही दोषियों को गिरफ़्तार नहीं किया जा रहा है. तब वो केंद्रीय राज्य मंत्री थीं लेकिन बसु ने उनसे मुलाक़ात नहीं की.

पुलिसकर्मियों ने घसीटते हुए सीढ़ियों से नीचे उतारा

बसु के आने का समय होने पर जब लाख मान-मनौव्वल के बावजूद ममता वहाँ से टस से मस होने को राज़ी नहीं हुईं तब उनको और उस युवती को महिला पुलिसकर्मियों ने घसीटते हुए सीढ़ियों से नीचे उतारा और पुलिस मुख्यालय लालबाज़ार ले गए. इस दौरान उनके कपड़े भी फट गए.

ममता ने उसी दिन मौके पर ही कसम खाई थी कि अब वो मुख्यमंत्री बनकर ही इस इमारत में दोबारा कदम रखेंगी. उन्होंने अपनी कसम को पूरी निष्ठा के साथ निभाया. आख़िर 20 मई 2011 को क़रीब 18 साल बाद उन्होंने मुख्यमंत्री के तौर पर ही इस ऐतिहासिक लाल इमारत में दोबारा कदम रखा.

पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु तो ममता की राजनीति से इतने चिढ़ते थे कि उन्होंने कभी सार्वजनिक रूप से उनका नाम तक नहीं लिया था. इसकी बजाय वे हमेशा ममता को ‘वह महिला’ कह कर संबोधित करते थे.

सिंगूर में धरने के दौरान ममता बनर्जी

ममता बनर्जी का पूरा राजनीतिक करियर ऐसी कई घटनाओं से भरा पड़ा है. चाहे वर्ष 1990 में सीपीएम के एक कार्यकर्ता लालू आलम की ओर से हुआ जानलेवा हमला हो या फिर सिंगूर में टाटा परियोजना के लिए ज़मीन अधिग्रहण के ख़िलाफ़ 26 दिनों का अनशन. ऐसी हर घटना उनके करियर में निर्णायक मोड़ साबित होती रही है. 16 अगस्त 1990 को कांग्रेस की अपील पर बंगाल बंद के दौरान लालू आलम ने हाजरा मोड़ पर ममता के सिर पर लाठी से वार किया था. इससे उनकी खोपड़ी चटक गई थी लेकिन सिर पर पट्टी बंधवा कर वे दोबारा सड़क पर उतर पड़ीं.

ममता के क़रीबी रहे सौगत राय बताते हैं, “हमने तो मान लिया था कि अब ममता का बचना मुश्किल है लेकिन जीने और बंगाल के लोगों के लिए कुछ बेहतर करने की अदम्य ललक ने ही उनको बचाया था.”

ममता देश की सबसे मज़बूत इरादे वाली महिला नेताओं में से एक

‘दीदीः द अनटोल्ड ममता बनर्जी‘ शीर्षक से ममता की जीवनी लिखने वाली पत्रकार सुतपा पाल कहती हैं, “ममता देश की सबसे मज़बूत इरादे वाली महिला नेताओं में से एक हैं.
इस किताब में उन्होंने लिखा है, ”अपनी राजनीति के अनूठे स्वरूप और जुझारू प्रवृत्ति की वजह से दीदी ने अपने करियर में कई ऐसी चीज़ों को संभव कर दिखाया है, जिसकी पहले कल्पना तक नहीं की जा सकती थी. इनमें वाममोर्चा सरकार को अर्श से फ़र्श तक पहुँचाना भी शामिल है.”

ममता के राजनीतिक सफ़र पर ‘डिकोडिंग दीदी’ नाम की किताब लिखने वाली पत्रकार दोला मित्र कहती हैं, “देश में किसी और महिला नेता की गतिविधियों के प्रति लोगों में उतनी दिलचस्पी नहीं रहती, जितनी दीदी के नाम से मशहूर ममता बनर्जी के प्रति रहती है. यह उनके जादुई व्यक्तित्व का ही करिश्मा है.”

ममता बनर्जी का राजनीतिक सफ़र

ममता बनर्जी का राजनीतिक सफ़र 21 साल की उम्र में साल 1976 में महिला काँग्रेस महासचिव पद से शुरू हुआ था.

साल 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनावों में पहली बार मैदान में उतरी ममता ने माकपा के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी को पटखनी देते हुए धमाके के साथ अपनी संसदीय पारी शुरू की थी.

राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहने के दौरान उनको युवा काँग्रेस का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया.

वो कांग्रेस विरोधी लहर में 1989 का लोकसभा चुनाव हार गईं लेकिन इससे हताश हुए बगैर अपना पूरा ध्यान उन्होंने बंगाल की राजनीति पर केंद्रित कर लिया.

साल 1991 के चुनाव में वे लोकसभा के लिए दोबारा चुनी गईं. उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

उस साल चुनाव जीतने के बाद पीवी नरसिंह राव मंत्रिमंडल में उन्हें युवा कल्याण और खेल मंत्रालय का ज़िम्मा दिया गया. लेकिन केंद्र में महज दो साल तक मंत्री रहने के बाद ममता ने केंद्र सरकार की नीतियों के विरोध में कोलकाता की ब्रिगेड परेड ग्राउंड में एक विशाल रैली का आयोजन किया और मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया.

तब उनकी दलील थी कि वह राज्य में माकपा की अत्याचार के शिकार कांग्रेसियों के साथ रहना चाहती हैं.

घोष बताते हैं कि राजनीतिक करियर के शुरुआत से ही ममता का एकमात्र मक़सद बंगाल की सत्ता से वामपंथियों को बेदख़ल करना था. इसके लिए उन्होंने कई बार अपने सहयोगी बदले.

कभी उन्होंने केंद्र में एनडीए का दामन थामा तो कभी कांग्रेस का. वर्ष 2012 में टाइम पत्रिका ने उन्हें विश्व के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया था.

 

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