आखिर किसके इशारे पर मुख्यमंत्रियों को ख़ामोशी से हटा देती है बीजेपी!

लखनऊ। पांच साल से गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी ने ये कहते हुए अपना पद छोड़ दिया है. ये ज़ाहिर है कि इस्तीफ़ा देने का आदेश उन्हें केंद्रीय नेतृत्व से मिला था.
“मैं मानता हूं कि गुजरात के विकास की यात्रा नए नेतृत्व में नई ऊर्जा और जोश के साथ चलती रहनी चाहिए. इसी विचार के साथ मैंने गुजरात के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया है.”
येदियुरप्पा ने ये भी कहा था कि वो अब पार्टी को मज़बूत करने के लिए काम करेंगे. इसका एक संदेश ये भी था कि उनके सीएम रहते पार्टी को लग रहा था कि पार्टी कमज़ोर हो रही है.

इसी साल कर्नाटक,असम और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने दिया था इस्तीफ़ा

अभी डेढ़ महीना पहले ही कर्नाटक के कद्दावर नेता बीएस येदियुरप्पा को पार्टी ने मुख्यमंत्री पद से हटा दिया.गवर्नर को इस्तीफ़ा सौंपने के बाद येदियुरप्पा ने कहा था कि उन पर केंद्रीय नेतृत्व का कोई दबाव नहीं है.

उत्तराखंड के तीरथ सिंह रावत तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर सही से बैठ भी नहीं पाए थे कि पार्टी ने उन्हें हटाने का फ़ैसला कर लिया.इसी साल मार्च में त्रिवेंद्र सिंह रावत को हटाए जाने के बाद तीरथ सिंह रावत बड़े हर्ष से सीएम की कुर्सी पर बैठे थे.
लेकिन जुलाई के पहले सप्ताह में ही उन्हें कुर्सी खाली करने का आदेश दे दिया गया और उन्होंने चुपचाप उसे स्वीकार कर लिया.

असम में भी पार्टी ने सर्बानंद सोनोवाल की जगह हिमंत बिस्वा सरमा को सीएम बनाया. सोनोवाल अभी केंद्र में मंत्री हैं.
इनमें किसी भी नेता ने किसी तरह का विरोध या असंतोष दर्ज नहीं किया है.

माना जा रहा है कि कोरोना महामारी को दौरान राज्य में उपजी नाराज़गी भी रुपाणी को हटाए जाने की एक वजह हो सकती है. लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि इसके जातिगत कारण अधिक हो सकते हैं.

हाल ही में संपन्न हुए सूरत लोकल बॉडी इलेक्शन में बिना किसी ठोस जनाधार वाली आम आदमी पार्टी ने 27 सीटें हासिल की थीं. इसने बीजेपी खेमे में चिंता पैदा कर दी है.रुपाणी जैन सुमदाय से आते हैं जिसकी आबादी राज्य में सिर्फ़ दो प्रतिशत है. वहीं बड़ा राजनीतिक आधार रखने वाला पाटीदार समुदाय में बीजेपी के प्रति नाराज़गी है.

राजनीतिक जानकार मानते है बीजेपी को काडर आधारित पार्टी

विश्लेषक मानते हैं कि इसकी एक बड़ी वजह ये है कि हटाए गए नेता ये बात जानते हैं कि उनके बोलने का बहुत अधिक असर नहीं होगा और पार्टी में उनकी जो जगह है वो उसे भी गंवा देंगे.
राजनीतिक जानकार मानते है कि बीजेपी एक काडर आधारित पार्टी है जिसमें कोई भी नेता तब तक ही नेता है जब तक काडर उसके साथ है.
जिस दिन काडर साथ छोड़ देता है, नेता की राजनीतिक हैसियत नहीं रह जाती है. नेता को भी पता होता है कि अगर वो बग़ावत करेंगे तो नतीजा क्या हो सकता है. यूपी के कल्याण सिंह, गुजरात के शंकर सिंह वाघेला और मध्य प्रदेश की उमा भारती इसका उदाहरण हैं. पार्टी में समर्थन ना रहने पर इन नेताओं को पद से हटा दिया गया था.”

जानकर रुपाणी को हटाए जाने को एक ज़रूरी सर्जरी के तौर पर देखते हैं. विजय त्रिवेदी कहते हैं कि इससे पहले की बीमारी लाइलाज होती, बीजेपी ने उसकी जड़ ही काट दी है.

पद से हटाए जाने के बावजूद किसी खास विरोध के ना होने की वजह

पद से हटाए जाने के बावजूद किसी खास विरोध के ना होने की एक वजह ये भी है कि बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व इस समय मज़बूत है और विरोध करने पर कुछ हासिल नहीं होगा. रुपाणी के कोई विरोध ना करने की एक वजह ये भी है कि वो जानते हैं कि वो अपने दम पर वोट हासिल नहीं कर सकते हैं. 2017 में केंद्रीय नेतृत्व ने ही उन्हें बिना किसी ख़ास सिफ़ारिश के मुख्यमंत्री बनाया था, अब जब केंद्रीय नेतृत्व को लग रहा है कि वो चल नहीं पाएंगे तो उन्हें हटा दिया गया है.

पार्टी को लग रहा है कि अगले साल दिसंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी रुपाणी के नेतृत्व में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकेगी. गुजरात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का गृह राज्य है. विश्लेषक मानते हैं कि पार्टी यहां कोई ख़तरा नहीं उठाना चाहेगी.