Covid-19: ऑक्सीजन कम होने पर किस पोजिशन में लेटने को बताते हैं डॉक्टर

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Covid-19: संक्रमित मरीज़ों के इलाज में दुनिया भर में प्रोनिंग तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है,

जिसमें मरीज़ों को पेट के बल लेटाया जा रहा है.

दुनिया भर में कोविड-19 संक्रमण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं.

इसके चलते अलग-अलग हिस्सों से अस्पतालों की तस्वीरें भी सामने आ रही हैं.

इन तस्वीरों में इंटेंसिव केयर यूनिट में अत्याधुनिक वेंटिलेटरों पर लेटे हुए मरीज़ दिखाई देते हैं.

वेंटिलेटरों से उन्हें सांस लेने में मदद मिलती हैं लेकिन इन तस्वीरों की एक ख़ास बात पर नज़रें टिक रही हैं.

बहुत सारे मरीज़ पेट के बल, आगे की ओर लेटे हुए हैं?

दरअसल, यह एक बेहद पुरानी तकनीक है जिसे प्रोनिंग कहते हैं,

इससे सांस लेने में समस्या होने वाले मरीज़ों को फ़ायदा होते हुए देखा गया है.

इस मुद्रा में लेटने से फेफेड़ों तक ज़्यादा ऑक्सिजन पहुंचती है.

Covid-19:ज्यादा ऑक्सिजन का मिलना

मरीज़ों को प्रोन पोजिशन में कई घंटों तक लिटाया जाता है ताकि उनके फेफड़ों में जमा तरल पदार्थ मूव कर सके.

इससे मरीज़ों को सांस लेने में आसानी होती है.

इंटेंसिव केयर यूनिट में कोविड-19 के मरीज़ों के साथ इस तकनीक का इस्तेमाल काफ़ी बढ़ा है.

डॉ. गालियातस्तोस ने कहा, “जब ऐसे मरीज़ों को ऑक्सीजन दी जाती है तो वह भी कई बार पर्याप्त नहीं होती है.

ऐसी स्थिति में हम उनको पेट के बल लिटाते हैं, चेहरा नीचे रहता है, इससे उनका फेफड़ा बढ़ता है.

गालियातस्तोस के मुताबिक़ इंसानी फेफड़े का भारी हिस्सा पीठ की ओर होता है

इसलिए जब कोई पीठ के बल लेटकर सामने देखता है तो फेफड़ों में ज्यादा ऑक्सीजन पहुंचने की संभावना कम होती है.

इसकी जगह अगर कोई प्रोन पॉजिशन में लेटे तो फेफड़ों में ज़्यादा ऑक्सीजन पहुंचती है

और फेफड़े के अलग-अलग हिस्से काम करने की स्थिति में होते हैं.

डॉ. गालियातस्तोस ने कहा, “इससे बदलाव दिखता है.

हमने इस तकनीक से कई मरीज़ों को फ़ायदा मिलते देखा है.”

अमरीकी थोरासिस सोसायटी ने चीन के वुहान स्थित जियानतान हॉस्पिटल में फ़रवरी महीने में

एआरडीएस वाले 12 कोविड मरीज़ों पर अध्ययन किया.

इस अध्ययन के मुताबिक़ जो लोग प्रोन पॉजिशन लेट रहे थे उनके फेफड़ों की क्षमता ज़्यादा थी.

Covid-19:तकनीक के ख़तरे

हालांकि यह तकनीक बहुत आसान लग रही है लेकिन इसके अपने ख़तरे भी हैं.

डॉ. गालियातस्तोस ने बताया, मरीज़ों को उनके पेट पर लिटाने में वक़्त लगता है.

इसमें अनुभवी चार या पांच पेशेवरों की ज़रूरत भी होती है.

लेकिन मरीज़ों की पोजिशन बदलने में दूसरी अन्य मुश्किलें भी शुरू हो सकती हैं.

डॉ. गालियातस्तोस ने बताया, “हमारी बड़ी चिंताओं में मोटापा एक है.

हमें छाती में इंजरी वाले मरीज़ों के साथ भी सावधान होना होता है.

इसके अलावा वेंटिलेशन औरर कैथेटर ट्यूब वाले मरीजों में सावधानी बरतनी होती है.”

हालांकि इस तकनीक से हार्ट अटैक का ख़तरा भी बढ़ जाता है

और कई बार सांस में अवरोध भी पैदा हो सकता है.

Covid-19 तकनीक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल

1970 के दशक के मध्य में प्रोनिंग के फ़ायदे को पहली बार देखा गया था.

विशेषज्ञों के मुताबिक 1986 के बाद दुनिया भर के अस्पतालों में इस तकनीक का इस्तेमाल शुरू हुआ.

लुसियानो गातिनोनी इस तकनीक पर शुरुआती अध्ययन और अपने मरीज़ों पर

सफलातपूर्वक इस्तेमाल करने वाले डॉक्टरों में एक रहे हैं.

लुसियानो इन दिनों एनिस्थिसियोलॉजी (निश्चेत करने वाले विज्ञान) एवं पुनर्जीवन से जुड़े विज्ञान के एक्सपर्ट हैं.

इसके अलावा वे मिलान स्टेट यूनिवर्सिटी में एमिरेट्स प्रोफ़ेसर हैं.

प्रोफ़ेसर लुसियानो ने कहा, इस तकनीक का काफ़ी इस्तेमाल होता है.”

उनके मुताबिक़ प्रोनिंग से फेफड़ों में ऑक्सिजन की मात्रा बढ़ने के अलावा दूसरे फ़ायदे भी हैं.

उन्होंने बताया, “जब मरीज़ चेहरा नीचे करके लेटता है तो ,

उसके फेफड़ों के अलग-अलग हिस्सों एकसमान दबाव वितरीत होता है.

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